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हम धर्म को चरित्र-निर्माण का सीधा मार्ग और सांसारिक सुख का सच्चा द्वार समझते हैं। हम देश-भक्ति को सर्वोत्तम शक्ति मानते हैं जो मनुष्य को उच्चकोटि की निःस्वार्थ सेवा करने की  ओर प्रवृत्त करती है।
- मालवीय जी

महामना पं0 मदन मोहन मालवीय का जीवन-परिचय
(1861-1946)

भारतीय ज्ञान-सम्पदा व सांस्कृतिक धरोहर की प्रतिमूर्ति महामना पं0 मदन मोहन मालवीय मध्य भारत के मालवा के निवासी पं0 प्रेमधर के पौत्र तथा पं0 विष्णु प्रसाद के प्रपौत्र थे। पं0 प्रेमधर जी संस्कृत के मूर्धन्य विद्वान थे। पं0 मदन मोहन मालवीय के पूर्वजों के तीर्थराज प्रयाग (इलाहाबाद) में बस जाने का मन बनाया, जबकि उनके परिवार के कुछ सदस्यों ने पड़ोसी शहर मीरजापुर को अपना निवास स्थान बनाया। पं0 प्रेमधर जी भागवत की कथा को बड़े सरस ढंग से वाचन व प्रवचन करते थे। मदन मोहन अपने पिता पं0 ब्रजनाथ जी के छः पुत्र-पुत्रियांे में सबसे अधिक गुणी, निपुण एवं मेधावी रहे। उनका जन्म 25 दिसम्बर, 1861 ई0 (हिन्दू पंचाङ्ग के अनुसार पौष कृष्ण अष्टमी, बुधवार, सं0 1918 विक्रम) को प्रयाग के लाल डिग्गी मुहल्ले (भारती भवन, इलाहाबाद) में हुआ था। उनकी माता श्रीमती मोना देवी, अत्यन्त धर्मनिष्ठ एवं निर्मल ममतामयी देवी रही। मदन मोहन की प्रतिभा में अनेक चमत्कारी गुण रहे, जिनके कारण उन्होंने ऐसे सपने देखे जो भारत-निर्माण के साथ-साथ मानवता के लिए श्रेष्ठ आदर्श सिद्ध हुए। इन गुणों के कारण ही उन्हें महामना के नाम-रूप में जाना-पहचाना जाता है।
शिक्षा:-
महामना की प्रारंभिक शिक्षा प्रयाग के महाजनी पाठशाला में 5 वर्ष की आयु में आरम्भ हुई थी। पं0 मदन मोहन मालवीय जी ने अपने व्यवहार व चरित्र में हिन्दू संस्कारों को भली-भांति आत्मसात् किया था। इसी के फलस्वरूप वे जब भी प्रातःकाल पाठशाला को जाते तो प्रथमतः हनुमान-मन्दिर में जाकर प्रणामा्जलि के साथ यह प्रार्थना अवश्य दुहराते थे:

मनोत्रवं मारूत तुल्य वेगं जितेन्द्रियं बुद्धिमतां वरिष्ठम्
वातात्मजं वानरयूथ मुख्यं श्री रामदूतं शिरसा नमामि ।

श्री कृष्णजन्माष्टमी के महोत्सव को वे सच्च मन व हृदय से धूमधाम के साथ मनाने थे। 15 वर्ष के किशोर वय में ही उन्होंने काव्य रचना आरम्भ कर दी थी जिसे वे अपने उपनाम मकरन्द से पहचाने जाते रहे। मैट्रिक परीक्षा सन् 1864 में प्रयाग राजकीय हाईस्कूल से उत्तीर्ण कर, म्योर सेण्ट्रल काॅलेज में दाखिल हुए। विद्यालय व कालेज दोनों जगहों पर उन्होंने अनेक सांस्कृतिक व सामाजिक आयोजनों में सहभागिता की। सन् 1880 ई0 में उन्होंने हिन्दू समाज की स्थापना की।
विवाह:-
उनका विवाह मीरजापुर के पं0 नन्दलाल जी की पुत्री कुन्दन देवी के साथ 16 वर्ष की आयु में हुआ था। 
सामाजिक कार्य:-
पं0 मदन मोहन मालवीय जी कई संस्थाओं के संस्थापक तथा कई पत्रिकाओं के सम्पादक रहे। इस रूप में वे हिन्दू आदर्शों, सनातन धर्म तथा संस्कारों के पालन द्वारा राष्ट्र-निर्माण की पहल की थी। इस दिशा में प्रयाग हिन्दू सभा की स्थापना कर समसामयिक समस्याओं के संबंध में विचार व्यक्त करते रहे। सन् 1884 ई0 में वे हिन्दी उद्धारिणी प्रतिनिधि सभा के सदस्य, सन् 1885 ई0 में इण्डियन यूनियन का सम्पादन, सन् 1887 ई0 में भारत-धर्म महामण्डल की स्थापना कर सनातन धर्म के प्रचार का कार्य किया। सन् 1889 ई0 में हिन्दुस्तान का सम्पादन, 1891 ई0 में इण्डियन ओपीनियन का सम्पादन कर उन्होंने पत्रकारिता को नई दिशा दी। इसके साथ ही सन् 1891 ई0 में इलाहाबाद हाईकोर्ट में वकालत करते हुए अनेक महत्वपूर्ण व विशिष्ट मामलों में अपना लोहा मनवाया था। सन् 1913 ई0 में वकालत छोड़ दी और राष्ट्र की सेवा का व्रत लिया ताकि राष्ट्र को स्वाधीन देख सकें।
यही नहीं वे आरम्भ से ही विद्यार्थियों के जीवन-शैली को सुधारने की दिशा में उनके रहन-सहन हेतु छात्रावास का निर्माण कराया। सन् 1889 ई0 में एक पुस्तकालय भी स्थापित किया।
इलाहाबाद में म्युनिस्पैलिटी के सदस्य रहकर सन् 1916 तक सहयोग किया। इसके साथ ही भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस के सदस्य के रूप में भी कार्य किया।
सन् 1907 ई0 में बसन्त पंचमी के शुभ अवसर पर एक साप्ताहिक हिन्दी पत्रिका अभ्युदय नाम से आरम्भ की, साथ ही अंग्रेजी पत्र लीडर के साथ भी जुड़े रहे।
पिता की मृत्यु के बाद पंडित जी देश-सेवा के कार्य को अधिक महत्व दिया। 1919 ई0 में कुम्भ-मेले के अवसर पर प्रयाग में प्रयाग सेवा समिति बनाई ताकि तीर्थयात्रियों की देखभाल हो सके। इसके बाद निरन्तर वे स्वार्थरहित कार्यो की ओर अग्रसर हुए तथा महाभारत, महाकाव्य के निम्नलिखित उदाहरण को अपना आदर्श जीवन बनाया -

न त्वहं कामये राज्यं न स्वर्गं न पुनर्भवम् ।
कामये दुःख तप्तानाम् प्राणिनामार्तनाशनम् ।।

उनका यह आदर्श बाद में काशी हिन्दू विश्वविद्यालय की पहचान बनी।
काशी हिन्दू विश्वविद्यालय का निर्माण:-
पं0 मदन मोहन मालवीय जी के व्यक्तित्व पर आयरिश महिला डाॅ0 एनीबेसेण्ट का अभूतपूर्व प्रभाव पड़ा, जो हिन्दुस्तान में शिक्षा के प्रचार-प्रसार हेतु दृढ़प्रतिज्ञ रहीं। वे वाराणसी नगर के कमच्छा नामक स्थान पर सेण्ट्रल हिन्दू काॅलेज की स्थापना सन् 1889 ई0 में की, जो बाद में चलकर हिन्दू विश्वविद्यालय की स्थापना का केन्द्र बना। पंडित जी ने तत्कालीन बनारस के महाराज श्री प्रभुनारायण सिंह की सहायता से सन् 1904 ई0 में बनारस हिन्दू विश्वविद्यालय की स्थापना का मन बनाया। सन् 1905 ई0 में बनारस शहर के टाउन हाल मैदान की आमसभा में श्री डी0एन0महाजन की अध्यक्षता में एक प्रस्ताव पारित कराया।
सन् 1911 ई0 में डाॅ0 एनीबेसेण्ट की सहायता से एक प्रस्तावना को मंजूरी दिलाई जो 28 नवम्बर 1911 ई0 में एक सोसाइटी का स्वरूप लिया। इस सोसायटी का उद्देश्य दि बनारस हिन्दू यूनिवर्सिटी की स्थापना करना था। 25 मार्च 1915 ई0 में सर हरकोर्ट बटलर ने इम्पिरीयल लेजिस्लेटिव एसेम्बली में एक बिल लाया, जो 1 अक्टूबर सन् 1915 ई0 को ऐक्ट के रूप में मंजूर कर लिया गया।
4 फरवरी, सन् 1916 ई0 (माघ शुक्ल प्रतिपदा, संवत् 1972) को दि बनारस हिन्दू यूनिवर्सिटी, की नींव डाल दी गई। इस अवसर पर एक भव्य आयोजन हुआ। जिसमें देश व नगर के अधिकाधिक गणमान्य लोग, महाराजगण उपस्थित रहे।

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